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अगर कोरोना को फैलने से नहीं रोका गया तो सबसे ज्यादा गाँवो में छोटे तबके के लोगों को रहेगा जान का ख़तरा


भारत में कोरोना के पहले मामलों को 50 के आंकड़े पर पहुंचने में करीब 40 दिन लगे थे, 100 के आंकड़े को छूने में और पांच दिन लगे, इसके तीन दिन के भीतर यह आंकड़ा 150 का हो गया और महज दो और दिनों में 300 का आंकड़ा पहुंच गया. अब इसके बाद इसका पहिया और तेजी से घूमने के बाद अभी लगभग 400 पर चल रहा है. पक्के मामलों की संख्या पांच या उससे भी कम दिनों में दोगुनी हो रही है, जबकि इस महीने के शुरू में ऐसा होने में छह दिन लग रहे थे. इस तरह भारत में भी इसकी रफ्तार दुनिया के दूसरे देशों में जो रफ्तार है उसके बराबर हो गई है, अमेरिका में मामले हर दो दिन पर दोगुनी रफ्तार से बढ़ रहे हैं. भारत में दो दिन में कोरोना के मामलों की संख्या में सबसे बड़ी वृद्धि के बाद भी ऐसा नहीं लगता कि हम समझ पाए हैं कि यह हमारे यहां भी एक महामारी का रूप ले चुकी है और अगले कुछ सप्ताहों में स्थिति ऐसी हो सकती है जिसकी हमने कल्पना भी नहीं की होगी. आज जो आंकड़े तमाम न्यूज़ चैनलों से पता चल रहे हैं उनसे अंदाजा लगाया जा सकता है कि निकट भविष्य में क्या हो सकता है।

 उत्तर प्रदेश के हापुड़ ज़िले के पिलखुआ में एक युवा ने आत्महत्या कर ली। सुसाइड नोट से पता चला है कि उसे कोरोना होने का डर था और वह लंबे समय से घर से कटा हुआ था। जनता कर्फ्यू के दौरान शाम 5 बजे लोगों ने घंटा, शंख, थाली पीटने की कवायद की। यह एक उदाहरण है कि आम नागरिकों में किस तरह से कोरोना वायरस का डर फैल गया है। बीते शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जनता कर्फ्यू की घोषणा के बाद देश में अफरा-तफरी और भगदड़ का माहौल था। पुणे, मुंबई और बेंगलूरु जैसे शहरों से जो ख़बरें आईं उससे लगा कि लोग अपने घरों तक पहुँचने की कवायद कर रहे हैं। रेलवे स्टेशनों पर बेतहाशा भीड़ बढ़ गई। आख़िरकार रेलवे को सभी ट्रेनें भी रद्द करनी पड़ी। जिससे लोगों की भीड़ को कम किया जा सके पटना शहर में बाहर से किसी तरह पहुँचे लोग बसों की छत पर यात्रा कर अपने गाँव-घर पहुँच जाना चाहते हैं। यह भारत की ही स्थिति नहीं है। यूरोप और अमेरिका में भी नौकरियाँ करने वाले अपने-अपने देशों में भाग रहे हैं। यहाँ तक कि यूरोप के देशों में भी कोरोना से कम प्रभावित इलाक़ों के लिए लोग उड़ान भर रहे हैं। ऐसे में यह बीमारी भयावह रूप लेती जा रही है और लोग इस वायरस को जगह जगह फैला रहे हैं। हालत यहाँ तक पहुँच गई कि जिन देशों की स्वास्थ्य सेवा दुनिया में बेहतर मानी जाती थी, वहाँ पूरी व्यवस्था चरमरा गई है और मौत के मामले बढ़ते ही जा रहे हैं। जिन इलाक़ों में कोरोना वायरस कम है, उन इलाक़ों की ओर पलायन और भारत में अपनों के बीच पहुँच जाने के लिए मची दौड़ इस बीमारी को फैलाने में अहम है।

भारत के गाँव अभी क़रीब क़रीब बचे हुए हैं। मौतों की ख़बरें ज़्यादातर महानगरों से आ रही हैं। ग्रामीण इलाक़ों में जगह ज़्यादा होने की वजह से लोग एक-दूसरे से दूरी रख सकते हैं, लेकिन जिस तरह से जनता कर्फ्यू के दौरान उत्सव का माहौल रहा और ज़िलाधिकारी से लेकर आम नागरिकों तक ने रैलियाँ निकालीं, उससे ऐसा नहीं लगता कि हम भारत के नागरिकों को यह बताने में कामयाब हो पाए हैं कि कोरोना वायरस को फैलने से कैसे रोका जा सकता है। ऐसे में देश के भीतर गाँवों में जाने को लेकर मज़दूरों के बीच मची भगदड़ भयावह रूप ले सकती है। अगर गाँवों में कोरोना वायरस फैल जाता है तो न वहाँ उपचार की सुविधा है, न लोगों के पास इतने पैसे हैं कि वह उपचार करा सकेंगे। सरकार द्वारा ट्रेन रोक देने की कवायद इस हिसाब से अहम है कि देश के ग्रामीण इलाक़ों में यह वायरस न फैलने पाए।

 लेखक:- आशुतोष कुमार सिंह
(कानून की पढ़ाई कर रहे है और एक स्वतंत्र लेखक भी हैं)

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