google.com, pub-1670991415207292, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Kumbh Top News: प्रभु प्रेमी संघ में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा - Hindi Top News | हिंदी टॉप न्यूज़

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Kumbh Top News: प्रभु प्रेमी संघ में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा

तीर्थ राज प्रयाग की पावन भूंमि पर सेक्टर 14 के प्रभु प्रेमी संघ में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा में पूज्य अवधेशानंद जी महाराज ने कहा की- शुद्ध मन तीर्थ के समान है। मन की पवित्रता आपको ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव करने में सक्षम बनाती है। भारतवर्ष की शुचिता, दिव्यता, कौटुम्बिक प्रवृत्तियाँ और ज्ञान-आलोक से सम्पूर्ण जगत प्रकाशित हो ..! शास्त्रों में धन्यता को उपलब्ध प्राणियों की चर्चा है। धरा पर धन्य वही हैं, वे ही चिरकाल से स्थापित हैं जिन्होंने अपने मनोविकार को जीत लिया, जिन्होंने अनियंत्रित भोग के परिणाम के सत्य को जान लिया और जिसे अंत:करण पर अनुशासन करना आ गया। चिरकालिक प्रसन्नता ऐन्द्रिक अनुशासन वालों के पास ही है। ऐन्द्रिक अनुशासन ही सबसे बड़ा अनुशासन है। चिर स्थायी प्रसन्नता उसी को अनभूत हुई है, जो आत्म संयमी है। जिसने कामनाओं को नियंत्रित किया है। जो अपनी कामनाओं पर विराम लगाना जानता है, ऐसा पुरुषार्थी साधक जीवन के बड़े आनंद का भागीदार बनता है। यदि हम आनंदित नहीं हैं, तो हमारी शैली में कोई दोष है। योग और साधना का पहला सोपान ही अनुशासन है। पूज्य "आचार्यश्री" जी ने कहा कि आत्म नियंत्रण की कला सीखिए। चुभन भरी ईर्ष्या, भय कारक टिप्पणी नहीं करना चाहिए। अपनी वाणी मनोभाव और विचार पवित्र रखिए। कामनाओं पर विराम चिन्ह लगे, स्वाध्याय, सत्संग और सन्त सन्निधि की सक्रियता जगे और लक्ष्य प्राप्ति की प्रबल भावना जीवन सार्थकता के साधन हैं। पूज्य आचार्य श्री जी कहा करते हैं कि अनियंत्रित कामना के कारण ही क्रोध आता है। जो ज्ञानी हैं, उनका क्रोध पानी पर लकीर जैसा होता है, जो ज्ञान की साधना कर रहे हैं उनका क्रोध बालू पर लकीर जैसा; जो ज्ञान के इच्छुक हैं, वे उतनी देर तक क्रोध में बने रहते हैं जितनी देर मिट्टी पर लकीर रहती है और जो अभी ज्ञान के पथ पर नहीं आये हैं, उनके हृदय में क्रोध उतनी देर तक बना रहता है जितनी देर लोहे पर लकीर। कामना विजातीय है, क्रोध भी विजातीय है, तभी हम उन्हें भीतर नहीं रख पाते, झट प्रकट कर देते हैं। "पूज्यश्री" जी ने कहा - स्वाध्याय, संत-सन्निधि और सत्संग जीवन की सकल दैवीय संभावनाओं के कपाट खोलने में समर्थ हैं। चित्त का स्थायी समाधान सत्संग से ही संभव है। मनोजयी, सर्वजयी होता है, इसमें कोई सन्देह नहीं। सबसे बड़ी विजय मन को जितना है। मनोजयी साधक प्रसन्नता को प्राप्त होता है, उसके जीवन मे हर पल आनन्द ही बना रहता है। यदि हम आनंदित नहीं हैं, तो हमारी शैली में कोई दोष है। मन का नाश संभव नही, मनोजयी बने, मृत्यु का नाश नही किया जा सकता। हाँ ! भगवान महामृत्युंजयी जी की कृपा से हम मृत्युंजयी बन सकते हैं। काल को मिटाया नही जा सकता, कालंजयी बना जा सकता है। जिसने अपने मन पर विजय प्राप्त कर लिया वह सच्चा साधक है। वह फिर ईश्वरीय अनुग्रह का, ब्रह्मरस का अथवा अमृत का अधिकारी बन जाता है ...।
पूज्य "आचार्य श्री जी ने कहा - साधना का पहला सोपान है - अंतःकरण की पवित्रता और अन्तिम सोपान भी है - अंतःकरण की पवित्रता। यह साधना निरंतर चलती रहती है। मन जब निर्मल होता है तब ही उसमें समता आ पाती है, तब हर तरह की परिस्थिति में वह शांत रहता है। ज्ञान की अग्नि से कामना जल जाती है। अतः जिसने ज्ञान को आचरण में उतार लिया, उसने ईश्वर को मूर्तिमान कर लिया। मानव जीवन में संत-सत्पुरुषों का, सद्गुरु का विशेष महत्व है, उनके सानिध्य एवं सम्पर्क में आने से जीवन की प्रत्येक गुत्थियाँ सुलझने लगती है। हमारे मानस पटल से अज्ञानता की परतें एक-एक करके हटाते हुए हमें वास्तविक जीवन लक्ष्य की ओर उन्मुख करते हैं। "सभी धर्मों, सम्प्रदायों, ऋषि-मुनियों ने सद्गुरु की प्राप्ति को ही ब्रह्म की प्राप्ति एवं उसका साधन बताया है। रामायण में प्रभु श्रीराम जी ने गुरु की महत्ता को सर्वश्रेष्ठ कहा है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण जी ने कहा है कि सन्त व सद्गुरु मेरे ही रूप हैं। चैतन्य रूप सद्गुरु की साक्षात् सेवा के फलस्वरूप उनकी कृपा से क्षणमात्र में ही जीवन के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। "पूज्य आचार्यश्री" जी ने कहा कि वस्‍तुएँ बल से छीनी अथवा धन से खरीदी जा सकती हैं; किन्‍तु ज्ञान अध्‍ययन से ही प्राप्‍त हो सकता है। शिक्षा का केवल यही अर्थ नहीं है कि आदमी दो वक्त की रोटी कमाने के योग्य हो जाए। धन तो बिना पढ़े-लिखे लोगों के जीवन में भी आ जाता है। वास्तव में, शिक्षा से मनुष्य पशु जैसी स्थिति से बाहर निकलकर मनुष्य बन जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि विद्या मनुष्य का मानसिक संस्कार करती है। शिक्षा अर्जित करने के लिए विषय, परिश्रम और एकाग्रता की आवश्यकता पड़ती है। जिस संस्थान में आप शिक्षित हो रहे हैं, उसका भी महत्व होता है। अच्छी शिक्षा के लिए ये चार बातें आवश्यक हैं, लेकिन बात यहीं समाप्त नहीं हो जाती। शिक्षा के साथ स्वाध्याय को जोड़ना पड़ेगा। बच्चों को समझाना होगा कि जितनी आवश्यक शिक्षा है उतना ही महत्वपूर्ण है - स्वाध्याय को समझना। स्वाध्याय का सीधा अर्थ होता है - स्वयं का अध्ययन। इसे आत्म-शिक्षण भी कहते हैं। इसमें चिंतन, मनन और अध्ययन तीन बातें आती हैं। शिक्षा के साथ ये तीन बातें जुड़ जाएं तो जो सफलता हाथ लगती है वह बहुत दृढ़ होती है। शिक्षा पूर्ण ही तभी होगी जब मनुष्य स्वाध्याय से गुजरेगा। शिक्षा यदि परिश्रम है तो स्वाध्याय तप है। शिक्षा यदि सुख और सफलता प्रदान करती है तो स्वाध्याय धैर्य और शांति देगा। शिक्षा हमें उन केंद्रों पर ले जाती है, जहां मनुष्य की सफलता के सूत्र बसे हुए हैं। अतः स्वाध्याय हमें वासनाओं की जड़ों तक ले जाएगा, जिसका समूलोच्छेदन ज्ञान के द्वारा ही सम्भव हो पायेगा।रिपोर्टर -विकास राय

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