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करतारपुर साहिब: बर्लिन की दीवार ढहनी चाहिए

सिख समुदाय द्वारा पिछले 70 सालों से करतारपुर गलियारे संबंधी की जा रही मांग स्वीकार करने के बाद प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी भी गुरु नानाक देव जी के भक्त लाला दुनीचंद जी की श्रेणी में आगए हैं जिन्होंने गुरु जी को 100 एकड़ जमीन दान देकर अपने को कृतज्ञ किया था। लाला दुनीचंद के बारे बताया जाता है कि वे दिल्ली में शासन कर रही लोधी राजवंश सत्ता के गवर्नर थे और गुरु नानक देव जी के सच्चे श्रद्धालु भी। इतिहासकार बताते हैं कि 1522 में वे गुरु जी के संपर्क में आए। सिख धर्म में ननकाना साहिब, अमृतसर, सुल्तानपुर लोधी सहित असंख्य आस्था स्थल हैं जिनमें करतारपुर साहिब का अपना ही महत्त्व है। गुरु नानक देव जी ने रावी नदी के किनारे एक नगर बसाया और यहां खेती कर उन्होंने नाम जपो, किरत करो और वंड छको (नाम जपें, परिश्रम करें और बांट कर खाएं) का सिद्धांत दिया था। इतिहास के अनुसार गुरु जी की तरफ से भाई लहणा जी को गुरु गद्दी भी इसी स्थान पर सौंपी गई थी जिन्हें दूसरे गुरु अंगद देव जी के नाम से जाना जाता है और आखिर में गुरुनानक देव जी यहीं पर ज्योति ज्योत समाए। बताया जाता है कि लंगर और पंगत की परंपरा भी यहीं से शुरू हुई।

सदियों तक यह स्थान श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना रहा परंतु देश के विभाजन के बाद यह पाकिस्तान में चला गया। करतारपुर साहिब, पाकिस्तान के नारोवाल जिले में है। यह जगह लाहौर से 120 किलोमीटर और भारतीय सीमा से महज 4 किलोमीटर दूर है जिस जगह पर गुरुद्वारा बना हुआ है। अपने आस्था स्थलों के बिछडऩे का सिख समाज को अत्यंत दुख हुआ और इसकी सेवा संभाव को अपने हाथों में लेेने के लिए विभाजन के तुरंत बाद ही ललायित हो उठे। उन्होंने अपने दैनिक असरास में अपनी इस इच्छा को शामिल किया कि- श्री ननकाना साहिब ते होर गुरुद्वारेयां, गुरुधामां दे, जिनां तों पंथ नूं विछोडय़ा गया है, खुले दर्शन दीदार ते सेवा संभाल दा दान खालसा जी नूं बख्शो...।Ó (अर्थात ननकाना साहिब और बाकी गुरुद्वारे या गुरुधाम जो बंटवारे के चलते पाकिस्तान में रह गए उनके खुले दर्शन सिख कर सकें इसकी हम मांग करते हैं।)
सिख संगत द्वारा की जाने वाली अरदास को उस समय बोर पडऩा शुरू हुआ जब 1974 में भारतीय सेना ने इस मामले को पाकिस्तान के समक्ष उठाया।  1999 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी बस लेकर लाहौर पहुंचे तो इस मसले को फिर उठाया गया। अकाली दल के नेता कुलदीप सिंह वडाला के तरफ से 2001 में - करतारपुर रावी दर्शन अभिलाखी संस्था की शुरुआत की गई थी और 13 अप्रैल 2001 के दिन बैसाखी के दिन अरदास की शुरुआत हुई। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के समक्ष पहले 2004 फिर 2009 में इस मुद्दे को उठाया गया और उन्होंने पाकिस्तान के साथ इसको लेकर बातचीत करने का भरोसा दिलवाया। 2010 और 2012 में अकाली दल बादल और भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने पंजाब विधानसभा में दो बार प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजे। जुलाई 2012 में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के अध्यक्ष जत्थेदार अवतार सिंह मक्कड़ ने गलियारा खोलने की वकालत करते हुए कहा था कि पाकिस्तान ने 1999 में तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पाकिस्तान यात्री के वक्त इसे खोलने की पेशकश की थी लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी। स्थायी गलियारे की मांग करने वालों की उम्मीद उस समय टूट गई जब 2 जुलाई 2017 को शशि थरूर की अध्यक्षता वाले विदेश मामलों की सात सदस्यीय संसदीय समिति के सदस्यों ने इस कॉरिडोर की मांग को रद्द कर दिया, जिसमें यह कहा गया था कि मौजूदा राजनीतिक माहौल इस कॉरिडोर को बनाने के अनुकूल नहीं है।
इतने लंबे संघर्ष के दौरान सिख समुदाय ने अपनी मांग नहीं छोड़ी। करतारपुर साहिब के प्रति श्रद्धा को देखते हुए सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने भारत-पाक सीमा पर एक जगह बना दी जहां पर दूरबीन से लोग दूर से ही इसके दर्शन करने लगे। इस बीच गाहे-बगाहे करतारपुर गलियारे की मांग उठती रही परंतु कुछ होता नहीं दिखा। वर्तमान में दुनिया गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाशोत्सव वर्ष को समर्पित समारोह मना रही है तो प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने करतारपुर गलियारे की मांग को मानते हुए समारोह के हर्षोल्लास को और बढ़ा दिया है। हर्ष की बात है कि पाकिस्तान ने भी इस योजना को स्वीकृति दे दी है। ऐसा होने पर सिख तीर्थयात्री बिना वीजा करतारपुर आ सकेंगे। सरकार यहां अपने नागरिकों को हर तरह की अंतरराष्ट्रीय स्तर की सुविधाएं भी उपलब्ध करवाने जा रही है।

दिल्ली में आयोजित प्रकाशोत्सव पर्व पर अपने संबोधन में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि करतारपुर गलियारा दोनों देशों की जनता को एक दूसरे की करीब लाएगा। उन्होंने कहा कि जब बर्लिन की दीवार ढह सकती है तो हमारे बीच की दूरीयां भी खत्म हो सकती हैं। यह प्रधानमंत्री की सद्इच्छा हो सकती है परंतु सकारात्मक सोच दिखाने के तुरंत बाद पाकिस्तान से दूसरी खबर भी आई है कि उसने अपने यहां खालिस्तानी आतंकी संगठनों को दोबारा से गठित करना शुरू कर दिया है। अभी गुरुपर्व पर ननकाना साहिब स्थित गुरुद्वारे में खालिस्तान को लेकर भारत के विरुद्ध खुल कर आतंकवाद समर्थक पोस्टर लगाए गए। भारतीय श्रद्धालुओं को देश के खिलाफ भड़काया गया और भारतीय दूतावास के अधिकारियों को उन्हें मिलने तक नहीं दिया गया। केवल इतना ही नहीं अभी हाल ही में अमृतसर के राजासांसी के करीब निरंकारी आश्रम में हुए आतंकी हमले के पीछे भी पाकिस्तान का षड्यंत्र बताया जारहा है जिसमें 3 निर्दोष भारतीयों की मौत हो गई और 19 लोग घायल हो गए। गुप्चर एजेंसियों से मिल रही सूचनाएं बताती हैं कि पाकिस्तान भारतीय पंजाब में फिर से खालिस्तानी आतंकवाद को हवा दे रहा है। पाकिस्तान की यह हरकत दोनों देशों के बीच हुए शिमला समझौते व जेनेवा कान्फ्रेंस के नियमों का उल्लंघन है जिसमें साफ-साफ कहा गया है कि कोई भी देश अपने यहां पड़ौसी देश के खिलाफ सक्रिय अपराधी तत्वों को सहयोग नहीं देगा।

दोनों देशों की जनता के दिलों के बीच गलियारा बनाने के लिए भी पाकिस्तान को करतारपुर गलियारे की तरह सहयोगात्मक रवैया अपनाना होगा और भारत को अभी भावनाओं में बहने की बजाय सतर्क हो कर चलना होगा। दोनों देशों का प्रयास हो कि उनके बीच बनी नफरत, अविश्वास रूपी बर्लिन की दीवार ढहनी ही चाहिए।
- राकेश सैन
32 खण्डाला फार्मिंग कालोनी
वीपीओ रंधावा मसंदा,
जालंधर।

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